कोलकाता, 05 अगस्त आजादी की इस महकती धारा के दौरान, जब हमारे देश ने स्वतंत्रता प्राप्त की, लाखों क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। कई क्रांतिकारियों की वीरता विश्वभर में जानी जाती है, जबकि कई ऐसे भी थे जिनकी बहादुरी गुमनाम रह गई। हिन्दुस्थान समाचार ने ऐसे ही गुमनाम नायकों को उजागर करने की जिम्मेदारी उठाई है। इनमें से एक थे बंगाल के सच्चे नायक सुशील कुमार सेन, जिनकी वीरता को मान्यता देते हुए बंगाल के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने उन्हें सत्येंद्र नाथ बोस स्वर्ण पदक प्रदान किया था।
सुशील कुमार सेन का जन्म 1892 में कोलकाता के सियालदह में हुआ था, जब देश में स्वतंत्रता संग्राम अपने उफान पर था। युवा सुशील कुमार ने इस प्रभाव को बचपन से ही महसूस किया और अपने छात्र जीवन में ही क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए। नेशनल कॉलेज, कलकत्ता में पढ़ाई करते समय, वे सुरेंद्रनाथ बनर्जी और अन्य क्रांतिकारियों की प्रेरणा से आंदोलनों में सक्रिय हो गए थे।
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एक बार, जब छात्रों का एक बड़ा समूह न्यायालय के सामने विरोध प्रदर्शन कर रहा था, अंग्रेजी पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए सैकड़ों सशस्त्र पुलिसकर्मियों को भेजा। इस दौरान एक अंग्रेज सार्जेंट ने छात्रों पर क्रूरता बरपाई। सुशील कुमार सेन ने साहसिकता का परिचय देते हुए उस सार्जेंट को धरती पर पटक दिया और उसकी अस्त्र-शस्त्र छीन लिए। उन्होंने सार्जेंट को इतनी बुरी तरह से पीटा कि वह लहूलुहान होकर भाग खड़ा हुआ। उनकी इस बहादुरी पर खुश होकर सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने उन्हें सत्येंद्र नाथ बोस स्वर्ण पदक दिया।
इस घटना के बाद, किंग्सफोर्ड की अदालत ने सुशील कुमार पर मुकदमा चलाया और उन्हें 15 बेंत की सजा दी। किंग्सफोर्ड उस समय क्रांतिकारियों को कठोर दंड देने के लिए कुख्यात था। इसके बाद, किंग्सफोर्ड की हत्या की योजना बनाई गई और सुशील कुमार सेन को हथियार जुटाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। हालांकि, 1908 में अलीपुर बम ब्लास्ट केस में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय उनकी उम्र केवल 16 साल थी। सुशील कुमार और उनके साथी क्रांतिकारियों को सात साल तक जेल की कठोर सजा भुगतनी पड़ी।
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जेल से रिहा होने के बाद, सुशील कुमार सेन ने कलकत्ता पुलिस के इंस्पेक्टर सुरेश मुखर्जी की हत्या कर दी। पुलिस ने उन्हें पकड़ने की पूरी कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाई। इसके बाद, गदर पार्टी की अपील पर हथियारों की आपूर्ति के लिए एक राजनीतिक डकैती की योजना बनाई गई। 30 अप्रैल, 1915 को, नदिया जिले के दौलतपुर थाना क्षेत्र के प्रागपुर गांव में, अंग्रेजों के सहायक रहे साहूकार हरिनाथ साहा की दुकान में डकैती की गई। सुशील कुमार सेन इस डकैती में मुख्य भूमिका में थे। डकैती के बाद, क्रांतिकारी नाव में सवार होकर लौट रहे थे, तभी पुलिस ने उन पर फायरिंग की। मुठभेड़ में सुशील कुमार को गोली लग गई और वे नाव पर ही शहीद हो गए। उनकी उम्र उस समय केवल 22 साल थी।
उनके साथियों ने सुशील कुमार के पार्थिव शरीर को हुगली नदी में सम्मानपूर्वक प्रवाहित किया। इसके बाद, पुलिस ने उनके सभी साथियों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें कालापानी की सजा दी गई।
सुशील कुमार सेन का बलिदान आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

