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जल उठा था 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बलिया, भागी अंग्रेजी हुकूमत


जल उठा था 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बलिया, भागी अंग्रेजी हुकूमत
Image Source By : Janjeevan

बलिया, 13 अगस्त

उत्तर प्रदेश का बलिया भी 1942 में शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन से अछूता नहीं रहा। बलिया की अगस्त क्रांति इस आंदोलन को प्रोत्साहित करने वाला एक महत्वपूर्ण अध्याय है। बलिया के वीरों ने अगस्त क्रांति में जो जज्बा और साहस दिखाया, वह अत्यंत सराहनीय है और यह पराधीनता के खिलाफ गहरी नाराजगी का स्पष्ट उदाहरण भी है। भारत छोड़ो आंदोलन की आग बलिया को पूरी तरह झुलसा रही थी, और यहाँ के लोग हर कीमत पर अंग्रेजी हुकूमत को समाप्त करने के लिए दृढ़ थे।

क्रांति आंदोलन का पहला चरण 9 अगस्त 1942 को शुरू हुआ। उसी दिन, 15 वर्षीय साहसी सूरज प्रसाद ने सेंसर की बाधाओं के बावजूद एक हिंदी समाचार पत्र लेकर उमाशंकर सिंह से संपर्क किया और भोंपा बजाकर महात्मा गांधी और अन्य प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी की जानकारी दी। इसके बाद, आंदोलन उग्र हो गया और बलिया में वीरों का उत्साह बढ़ गया। यह आंदोलन महिलाओं के सक्रिय भागीदारी के बिना पूरा नहीं होता। उन्होंने सबसे पहले जजी कचहरी पर तिरंगा फहराया, और उनके साहस को देखकर छात्राएं भी क्रांति के संग्राम में शामिल हो गईं। अगले दिन सुबह, उमाशंकर सोनार और उनके साथियों ने ओक्टेनगंज पुलिस चौकी के पूर्वी चौराहे पर क्रांति का शंखनाद किया। 11 अगस्त को, नगर के विद्यार्थियों ने जुलूस निकाला और चौक में सभा की। 12 अगस्त को आंदोलन ने विकराल रूप ले लिया, जिसकी गूंज देश-विदेश तक फैल गई।

क्रांति की इस लहर के दौरान भारत सचिव एमरी के आदेश पर महात्मा गांधी और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर जनता से अलग कर दिया गया। इसके विरोध में, स्कूली बच्चों द्वारा निकाले गए जुलूस पर शहर कोतवाल और डिप्टी कलेक्टर ने रेलवे स्टेशन के पश्चिमी क्रासिंग पर भारी लाठीचार्ज किया। 13 अगस्त को, महिलाओं ने भी आंदोलन में भाग लिया और जजी कचहरी पर तिरंगा फहराया। 14 अगस्त को, जब उन्होंने अपने घर की दादी मांओं के खून में उबाल और लाठी खाए देखे, तो स्कूली छात्राएं भी इस ज्वाला में कूद पड़ीं।

बांसडीह में, क्रांतिकारी छात्र जुलूस के रूप में कांग्रेस कमेटी के दफ्तर पर पहुंचे। 15 अगस्त को, आंदोलनकारियों ने जिलेभर में जोरदार प्रदर्शन किया। हजारों क्रांतिकारी इंकलाब जिंदाबाद और अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगाते हुए सुरेमनपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे और रेल पटरियों को उखाड़ फेंका। 16 अगस्त को, बलिया की महिला क्रांतिकारियों ने जुलूस निकाला और अंग्रेजों ने उन पर गोली चलाई, जिसमें नौ लोग शहीद हो गए। चितबड़ागांव रेलवे स्टेशन भी जलाया गया, और अन्य स्थानों पर भी रेलवे स्टेशन और डाकखाने फूंक दिए गए।

17 अगस्त को, रसड़ा में रेलवे स्टेशन और पटरियां जला दी गईं और डाकखाने को आग लगा दी गई। सभी मार्गों को अवरुद्ध करने के बाद, सहतवार में भी रेलवे स्टेशन, थाना और डाकखाने को जला दिया गया। बांसडीह तहसील पर जनता ने कब्जा कर लिया। 18 अगस्त को, बांसडीह थाना और तहसील का रिकॉर्ड जलाकर तिरंगा फहराया गया, और रेवती थाने को भी फूंक दिया गया। बैरिया में क्रांतिकारियों ने स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर योगदान दिया।

बैरिया की जनता ने अद्वितीय साहस और बहादुरी का प्रदर्शन किया। अपराह्न एक बजे हजारों क्रांतिकारी बैरिया थाने पर एकत्र हुए, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। तत्कालीन थानेदार ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें 19 लोग शहीद हो गए। 18 वर्षीय नौजवान कौशल कुमार ने थाने के पीछे से छत पर चढ़कर तिरंगा फहराना चाहा, लेकिन सिपाही महमूद खां ने गोली चला दी, जिससे कौशल कुमार तिरंगा लेकर लहूलूहान होकर गिर पड़े।

जिलेभर के आंदोलनकारी, किसान और छात्र बलिया जिला कारागार की ओर बढ़े। जेल में बंद क्रांतिकारियों को छुड़ाने के लिए लोगों ने जेल को घेर लिया। अंग्रेजों के होश उड़ गए, और जिला मजिस्ट्रेट जे निगम ने भारी जन-दबाव के बीच जेल का फाटक खोलवाया। सभी क्रांतिकारी जेल से बाहर आ गए, और कलेक्टर ने अपनी कुर्सी खाली कर दी, जिसे शेरे बलिया चित्तू पांडेय को सौंप दिया। इस प्रकार, बलिया ने भारत में सबसे पहले स्वतंत्र होने वाले क्षेत्र के कलेक्टर बनने का इतिहास कायम किया।