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जालौन के जलियांवाला बाग का वो किस्सा, जब तिंरगा यात्रा निकालने पर 11 देशभक्तों को मिली थी मौत


जालौन के जलियांवाला बाग का वो किस्सा, जब तिंरगा यात्रा निकालने पर 11 देशभक्तों को मिली थी मौत
Image Source By : Janjeevan

जालौन, 12 अगस्त जलियांवाला बाग का नाम सुनते ही अमृतसर में हुए दर्दनाक गोलीकांड की यादें ताजा हो जाती हैं, जिसमें अंग्रेजों ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाकर हत्या कर दी थी। इसी तरह की एक भयानक घटना यूपी के जालौन में भी घटी थी, जिसकी भयावह यादें आज भी जीवित हैं।

15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्रता का जश्न मना रहा था, तब जालौन का बाबनी स्टेट अभी भी गुलाम था। यहां के नवाब ने अपनी सत्ता का दुरुपयोग करते हुए एक खूनखराबा मचाया। बाबनी स्टेट में आजादी के दिन भी तिरंगा फहराना अपराध माना जाता था, क्योंकि यहां निजाम की सल्तनत थी, जिसके कानून सभी पर लागू थे। कुछ क्रांतिवीरों ने तिरंगा यात्रा निकालने का प्रयास किया, जिसके खिलाफ निजाम ने गोली चलवाने का आदेश दिया। इस गोलीकांड में 11 स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए और 26 घायल हुए। यह घटना पूरे देश में गूंज उठी और इसे दूसरे जलियांवाला बाग कांड के रूप में जाना गया।

25 सितंबर 1947 को बाबनी के देशभक्तों ने हरचंदपुर में तिरंगा फहराने की योजना बनाई, लेकिन यह खबर निजाम तक पहुंच गई। निजाम ने अपने अधीनस्थ कोतवाल को आदेश दिया कि तिरंगा यात्रा किसी भी हालत में नहीं निकलनी चाहिए। जब देशभक्त तिरंगा यात्रा लेकर गांव की गलियों से गुजर रहे थे, तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया। कोतवाल अहमद हुसैन ने अपने 24 सिपाहियों के साथ मौके पर पहुंचकर जुलूस को समाप्त करने का आदेश दिया। इसी बीच पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच झड़प हुई, और एक क्रांतिवीर ने दरोगा से रिवॉल्वर छीन ली। इसके बाद पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें 11 स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए और 26 घायल हुए।

इन शहीदों में लल्लू सिंह बागी, कालिया पाल सिजहरा, जगन्नाथ यादव उदनापुर, मुन्ना भुर्जी उदनापुर, ठकुरी सिंह हरचंदपुर, दीनदयाल पाल सिजहरा, बलवान सिंह हरचंदपुर, बाबूराम शिवहरे जखेला, बाबूराम हरचंदपुर और बिंदा जखेला शामिल थे।

मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद, 24 अप्रैल 1948 को विंध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री लालाराम गौतम ने बाबनी के नवाब को चार्ज सौंपा और 25 जनवरी 1950 को बाबनी स्टेट का पूरी तरह भारत संघ में विलय हो गया। हरचंदपुर में शहीदों की याद में एक स्मारक बनवाया गया, ताकि आने वाली पीढ़ियों को देश के लिए बलिदान देने की प्रेरणा मिल सके।

वरिष्ठ पत्रकार के.पी. सिंह बताते हैं कि इस घटना को दूसरा जलियांवाला बाग कांड कहा जाता है, क्योंकि पुलिस ने स्वतंत्रता सेनानियों को घेरकर गोलियां चलायीं, जैसा जलियांवाला बाग में हुआ था। बाबनी स्टेट का विलय भारत संघ में 1950 में हुआ, और इस प्रकार नवाबों की सल्तनत का अंत हुआ।

ग्राम प्रधान प्रतिनिधि देवेंद्र कुमार ने बताया कि गांव में बने शहीद स्मारक की स्थिति खंडहर में बदल चुकी है, हालांकि यह शहीदों की याद में बनाया गया था। शहीद के परिजन गया प्रसाद ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को आजादी के बाद तिरंगा यात्रा के जुलूस में गोलीकांड किया गया, जिसमें उनके ताऊ बाबूराम शिवहरे भी शहीद हुए थे।