महोबा, 20 अगस्त। "बुंदेलों की सुनो कहानी बुंदेलों की वाणी में, पानीदार यहां का पानी, आग यहां पर पानी में" जैसी पंक्तियाँ वीर भूमि की वीरता का परिचायक हैं। आज मंगलवार को ऐतिहासिक कजली महोत्सव का शुभारंभ शोभायात्रा के साथ होगा। इस महोत्सव में चित्रकूट, हमीरपुर, बांदा, छतरपुर, टीकमगढ़ और अन्य जगहों के लोग शामिल होने के लिए पहुंचते हैं।
जनपद मुख्यालय निवासी इतिहासकार डॉ. एलसी अनुरागी के अनुसार, सन 1182 ईस्वी में राजा परमाल की बेटी चंद्रावल अपनी सखियों के साथ भुजरियों का विसर्जन करने के लिए कीरत सागर पहुंची। इसी दौरान महोबा को घेरे बैठे पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडाराय ने हमला कर दिया। पृथ्वीराज चौहान ने राजा परमाल से अपने बेटे का विवाह चंद्रावल से करने की शर्त रखी, जिसे राजा परमाल ने स्वीकार नहीं किया। इसके परिणामस्वरूप दिल्ली के नरेश ने युद्ध की घोषणा कर दी। चंद्रावल ने आल्हा और ऊदल को पत्र भेजकर मातृभूमि की रक्षा के लिए मदद मांगी। आल्हा-ऊदल ने साधु का भेष धरकर महोबा पहुंचकर दिल्ली के नरेश को करारी हार दी और युद्ध में विजय प्राप्त की। विजय के बाद बुंदेलों ने कीरत सागर में भुजरियां विसर्जित की। तब से हर साल इस वीरता की याद में ऐतिहासिक कजली महोत्सव का आयोजन किया जाता है। बुंदेलों की वीरता के मद्देनजर कहा जाता है कि "बड़े लड़ाइयां महोबे वाले जिनसे हार गई तलवार।"
सावन की पूर्णमासी के दिन महोबा में दिल्ली के नरेश पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध हुआ था। युद्ध में विजय के अगले दिन, यहां की माताओं और बहनों ने भुजरियां विसर्जन कर अपने भाइयों को राखी बांधी। इसके बाद से बुंदेलखंड के महोबा में रक्षाबंधन के अगले दिन राखी बांधने की अनोखी परंपरा चली आ रही है। आज भी इस परंपरा के तहत ऐतिहासिक कजली महोत्सव का आगाज होगा, जिसमें भव्य जुलूस और सुंदर झांकियां आकर्षण का केंद्र रहेंगी।

