दीवान बरजोर सिंह के शौर्य से थर्रा गए थे अंग्रेज, बगावत की चिंगारी ने बिट्रिश हुकूमत को घुटनों पर ला दिया
Aug 13, 2024 | by Janjeevan
जालौन, 13 अगस्त
बुंदेलखंड में कई वर्षों तक राजवंशों का शासन रहा। 1802 में बेसिन की संधि के बाद अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में शासक के रूप में प्रवेश किया। उन्होंने जालौन और आसपास के गांवों में बदसलूकी के साथ राजस्व की वसूली शुरू कर दी। इस दमनकारी रवैये को देख बुंदेलों ने पहली बार अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका, और यह बगावत इतनी प्रभावशाली थी कि बुंदेलों ने ब्रिटिश सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
अंग्रेजों की राजस्व नीति से परेशान होकर बुंदेलों ने नए आंदोलन के समीकरण बनाए। इस विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने नौगांव छावनी में तैनात सेना नायक फावसैट को निर्देशित किया। 21 मई 1804 को, फावसैट ने सात कंपनियों और तोपखाने की एक टुकड़ी के साथ अमीटा की गढ़ी को घेर लिया और आक्रमण शुरू कर दिया।
अमीटा के परमार ने जब देखा कि अंग्रेज घेराबंदी में हैं, तो उन्होंने उन्हें झांसा देकर संधि की पेशकश की। अंग्रेजों को अपने जाल में फंसाने के बाद, अमीर खां ने अमीटा दुर्ग के बाहर खड़ी अंग्रेजी सेना की घेराबंदी कर ली। 22 मई 1804 को सुबह तक अंग्रेजी सेना चारों ओर से घिरी हुई थी। पिंडारी सेना और अंदर से घात लगाए बैठी परमार सेना ने अंग्रेजी सेना पर हमला किया।
इस भीषण गोलाबारी में अंग्रेजी सेना पराजित हुई। दो दिन तक चले इस युद्ध में अंग्रेजी सेना को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। भारतीय पैदल सेना की दो कंपनियां और तोपखाने की टुकड़ी के 50 अंग्रेजी सैनिक मारे गए। युद्ध में मारे गए अंग्रेजी अधिकारियों की समाधियां कोंच के सरोजनी नायडू पार्क और जल संस्थान के बीच पार्क में आज भी मौजूद हैं। इस पराजय के लिए फावसैट को जिम्मेदार ठहराया गया और उसे इंग्लैंड वापस भेज दिया गया।
अमीटा-बिलायां परिवार के दीवान बरजोर सिंह बुंदेलखंड के महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने सबसे लंबी अवधि तक अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। 1859 के मध्य तक, वे अंग्रेजी सेना के लिए एक बड़ा सिरदर्द बने रहे। 1 अप्रैल 1858 को झांसी में पराजय के बाद, रानी लक्ष्मीबाई ने कालपी की ओर जाते हुए बरजोर सिंह से भेंट की।
बरजोर सिंह से मिलने के बाद, रानी लक्ष्मीबाई कोंच चली गईं, जहाँ 7 मई 1858 को भीषण संघर्ष हुआ। 22 मई को कालपी के संघर्ष में भी बरजोर सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने गांव-गांव संपर्क साधा, आर्थिक संसाधन जुटाए, नाना साहब के सेनापति तात्याटोपे और जालौन की रानी ताईबाई की मदद की।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई कालपी और गोपालपुरा से होती हुई ग्वालियर की ओर चली गईं। अब क्रांति की जिम्मेदारी बरजोर सिंह पर आ गई। 31 मई 1858 को, ब्रिटिश सेना ने उनकी बिलायां गढ़ी पर हमला किया, जिसका उन्होंने डटकर मुकाबला किया।
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, जून 1859 तक उनके जीवित रहने के प्रमाण मिलते हैं। उनके वंशजों के अनुसार, वे जून 1859 में पलेरा (टीकमगढ़) चले गए थे, जहाँ लू लगने से उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार, स्वतंत्रता की यह ज्वाला कई वर्षों तक संघर्ष करके शांत हो गई। बाद में, जालौन के जिलाधिकारी एमलाज के प्रयासों से 15 अगस्त 1972 को बिलायां में उनका स्मारक चबूतरा बनाया गया, जो दीवान वीर बरजोर सिंह की शौर्यगाथा का प्रतीक है।

