आजादी विशेष : बंगाल के तारा पद ने देश का अनाज ले जा रहे अंग्रेजों को चटाई थी धूल, हो गए थे बलिदान
Aug 08, 2024 | by Janjeevan
कोलकाता, 8 अगस्त,
"लिख रहा हूं मैं अंजाम जिसका कल आगाज आएगा
मेरे लहू का हर एक कतरा इंकलाब लाएगा,
मैं रहूं या न रहूं पर ये वादा है मेरा तुमसे
कि मेरे बाद वतन पर मरने वालों का सैलाब आएगा"
ये पंक्तियां उन सात लाख 32 हजार क्रांतिकारियों की भावनाओं को व्यक्त करती हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। कई क्रांतिकारी ऐसे हैं जिन्हें पूरे देश में गर्व से याद किया जाता है, लेकिन कई अन्य ऐसे भी थे जो गुमनाम रह गए और अपनी मातृभूमि की सेवा में चुपचाप समर्पित हो गए। इन्हीं गुमनाम नायकों में से एक थे पश्चिम बंगाल के तारा पद गुइन। 1942-43 के दौरान, जब पूरा देश भयंकर अकाल से जूझ रहा था, ब्रिटिश सेना, जो द्वितीय विश्व युद्ध में उलझी हुई थी, भारत से किसानों द्वारा उगाए गए अनाज को जबरन छीनकर विदेश भेज रही थी। इस बीच, देशवासी भूख से मरने की कगार पर थे। अंग्रेजों द्वारा किसानों से जबरन अनाज छीनने और उसे ट्रेनों के माध्यम से विदेश भेजने की इस क्रूरता को तारा पद सहन नहीं कर पाए।
बीरभूम जिले के बोलपुर स्टेशन पर, तारा पद ने अपने साथियों के साथ उस ट्रेन को घेर लिया जिसमें अनाज जा रहा था। अंग्रेजों ने निहत्थे क्रांतिकारियों पर बर्बरता से गोलियां बरसाईं, जिससे तारा पद शहीद हो गए। उन्होंने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन ट्रेन को रवाना होने नहीं दिया। तारा पद के साथ सैकड़ों अन्य क्रांतिकारी भी घायल हुए, जिन्होंने बाद में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को और तेज किया। इस घटना के बाद बोलपुर स्टेशन से एक भी दाना विदेश नहीं भेजा गया।
तारा पद आजादी की लड़ाई के इतिहास में गुमनाम रहे हैं, यहां तक कि उनकी एक तस्वीर भी उपलब्ध नहीं है। बोलपुर में एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया है, और भारत सरकार ने 2006 में बोलपुर स्टेशन परिसर में एक स्मारक बनवाया, जिसका उद्घाटन तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने किया था। भारतीय रेलवे ने 'हूल एक्सप्रेस' ट्रेन भी इन क्रांतिकारियों के नाम पर चलाई है, जो हावड़ा स्टेशन से बीरभूम के सिउड़ी तक जाती है, जो कभी क्रांतिकारियों का गढ़ था।
इतिहासकार नागेंद्र सिन्हा अपनी किताब "अगस्त क्रांति के बलिदानियों" में लिखते हैं कि तारा पद इतिहास में इतने गुमनाम रहे कि उनके जन्म की तारीख और वर्ष भी ज्ञात नहीं हैं। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के बोलपुर में हुआ था। यहां रेलवे के बर्धमान खंड में स्थित बोलपुर एक प्रसिद्ध रेलवे स्टेशन है, जिसके पास ही तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर विश्वविख्यात शांति निकेतन भी है, जहां गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने वैश्विक शिक्षा के लिए विश्व भारती की स्थापना की थी।
1942 में जब क्रांतिकारी पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ अगस्त क्रांति चला रहे थे, तब बंगाल भी इस आंदोलन से अछूता नहीं था। बोलपुर में तारा पद इस क्रांति का नेतृत्व कर रहे थे। उस समय अंग्रेज दुनिया भर में द्वितीय विश्व युद्ध लड़ रहे थे और भारत में 1942-43 के दौरान भीषण अकाल पड़ा था, जिसके कारण भारतीय लोग भूख से मर रहे थे। बावजूद इसके, अंग्रेज भारत के विभिन्न हिस्सों से अनाज इकट्ठा कर बोलपुर रेलवे स्टेशन से अपने सिपाहियों के लिए विदेश भेज रहे थे। देशवासियों की यह स्थिति तारा पद गुइन से बर्दाश्त नहीं हुई, और उन्होंने बोलपुर रेलवे स्टेशन पर हमले की योजना बनाई।
29 अगस्त 1942 को, बोलपुर क्षेत्र में एक सफल हड़ताल का आयोजन किया गया। तारा पद के नेतृत्व में हजारों ग्रामीणों ने रेलवे स्टेशन पर धावा बोल दिया और अंग्रेजों के लिए हो रही अनाज की ढुलाई को रोक दिया। कई क्रांतिकारियों ने आसपास की सड़कों को जाम कर दिया, जिससे अंग्रेजी सिपाहियों को बाहर से मदद नहीं मिल सकी। इसके बाद, निहत्थे क्रांतिकारियों पर बर्बरता से लाठीचार्ज और फिर फायरिंग की गई, जिसमें सैकड़ों ग्रामीण घायल हो गए।
तारा पद ने देखा कि अधिक लोग मारे जाएंगे, तो वह खुद ही गोली चलाने वाले अंग्रेजों से भिड़ गए, जिसके दौरान उन्हें कई गोलियां मारी गईं। खून से लथपथ होकर वह गिर पड़े, लेकिन उनके बलिदान ने ग्रामीणों को और उग्र कर दिया, और उन्होंने स्टेशन पर तोड़फोड़ और आगजनी शुरू कर दी, जिससे अनाज विदेश भेजने का काम रोक दिया गया। तारा पद ने इस स्थिति में अपने प्राण मातृभूमि को समर्पित कर दिए।
इस महान क्रांति की याद को अमर बनाए रखने के लिए, बोलपुर स्टेशन परिसर में कांस्य धातु का एक स्मारक बनाया गया, जिसका उद्घाटन 29 अगस्त 2006 को तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने किया।

